पत्रकारिता की आड़ में वसूली का 'गंदा खेल', फर्जी पत्रकारों के सिंडिकेट पर कब कसेगा शिकंजा?
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प्रदेश जनहित खबर पोर्टल यूट्यूब चैनल लखनऊ रायबरेली
सह संपादक कपिल गुप्ता
आज के दौर में लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहे जाने वाली पत्रकारिता की छवि कुछ 'काले भेड़ियों' की वजह से धूमिल हो रही है। शहर से लेकर देहात तक, नीली-पीली बत्तियों वाली गाड़ियों और उन पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखे 'पत्रकार' शब्द का इस्तेमाल अब जनसेवा के लिए नहीं, बल्कि अवैध उगाही और दलाली के लिए किया जा रहा है।
हैरानी की बात यह है कि पुलिस प्रशासन की नाक के नीचे यह धंधा फल-फूल रहा है, लेकिन कार्रवाई के नाम पर केवल खानापूर्ति होती है।
गाड़ियों पर 'पत्रकार' का बोर्ड और वसूली का 'टारगेट'
सड़कों पर दौड़ती ऐसी तमाम गाड़ियाँ दिख जाएंगी जिन पर प्रेस या पत्रकार लिखा होता है। इनमें से अधिकांश वे लोग हैं जिनका किसी भी मान्यता प्राप्त संस्थान या पंजीकृत समाचार पत्र से कोई लेना-देना नहीं है। इनका मुख्य काम होता है:
अवैध खनन, ओवरलोडिंग और संदिग्ध निर्माण कार्यों को चिह्नित करना।
छोटे व्यापारियों और सरकारी कर्मचारियों को 'खबर चलाने' की धमकी देकर डराना।
मामले को रफा-दफा करने के नाम पर मोटी रकम की मांग करना।
पुलिस चौकियों में 'खास सेटिंग': सबसे बड़ा सवाल
जनता के बीच चर्चा का विषय यह है कि इन फर्जी पत्रकारों की पुलिस चौकियों और थानों में 'अच्छी खासी सेटिंग' रहती है। कई बार देखा गया है कि ये तथाकथित पत्रकार पुलिस और अपराधियों के बीच 'पुल' का काम करते हैं।
दलाली का अड्डा: कुछ पुलिसकर्मियों की शह पर ये लोग थानों में बैठकर फैसले करवाते हैं।
सूचनाओं का आदान-प्रदान: पुलिस को मुखबिरी देने के बहाने ये अपनी पैठ बनाते हैं और फिर उसी रसूख का इस्तेमाल अवैध वसूली में करते हैं।
कार्रवाई से क्यों बचते हैं ये 'दलाल'?
आखिर क्या वजह है कि प्रशासन इन पर हाथ डालने से कतराता है?
पहचान का संकट: सूचना विभाग के पास इनका कोई डेटाबेस नहीं होता, जिससे असली और फर्जी के बीच का अंतर आम आदमी नहीं समझ पाता।
डर का माहौल: झूठी खबरों या छवि खराब करने के डर से लोग इनके खिलाफ शिकायत करने की हिम्मत नहीं जुटा पाते।
सिस्टम का संरक्षण: जब पुलिस के साथ ही 'सांठ-गांठ' हो, तो कार्रवाई की उम्मीद बेमानी हो जाती है।
अंकुश लगाना क्यों जरूरी?
यदि इन 'काले कोट' और 'प्रेस कार्ड' की आड़ में छिपे अपराधियों पर नकेल नहीं कसी गई, तो फील्ड पर ईमानदारी से काम करने वाले पत्रकारों का मनोबल टूटेगा और समाज का मीडिया से भरोसा उठ जाएगा।
बड़ा सवाल: क्या शासन-प्रशासन ऐसे फर्जी पत्रकारों की गाड़ियों की चेकिंग और उनके पहचान पत्रों की जांच के लिए कोई ठोस अभियान चलाएगा? या फिर पत्रकारिता के नाम पर दलाली का यह 'धंधा' ऐसे ही निर्बाध चलता रहेगा ?